छऊ नृत्य (Chhau Dance)

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 छऊ नृत्य


छऊ नृत्य झारखण्ड का सर्वाधिक लोकप्रिय नृत्य है। अपनी प्रसिद्धि के कारण विद्वानों, अन्वेषकों और दर्शकों के लिए जिज्ञासा का विषय बन गया है देश-विदेश के विद्वानों इसके सम्बन्ध में केवल अनुसंधान ही नहीं कर रहे है, बल्कि प्रशिक्षण भी प्राप्त कर रहे है। इस लोकनृत्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कह पाना अत्यंत कठिन है।

छऊ नृत्य, जिसे छौ नाच भी कहा जाता है, मार्शल और लोक परंपराओं वाला एक अर्ध शास्त्रीय भारतीय नृत्य है। यह तीन शैलियों में पाया जाता है जिनका नाम उस स्थान के नाम पर रखा गया है जहां उनका प्रदर्शन किया जाता है, यानी पश्चिम बंगाल का पुरुलिया छऊ, झारखण्ड का सरायकेला छऊ और ओडिशा का मयूरभंज छऊ।



साधारणतः कुछ लोगों का मानना है कि मानभूम शैली के छऊ नृत्य की उत्पत्ति बाघमुण्डी में हुई थी। इसकी उत्पत्ति के सम्बंध में काल-निर्धारण करना भी कठिन है। लेकिन इतना तो मानना ही पड़ेगा कि छऊ नृत्य का सम्बन्ध शिवोपासना से है। सम्पूर्ण झारखण्डं प्रदेश के संदर्भ में देखा जाए तो कहा जा • सकता है कि यहाँ के लोग प्राचीन काल से शैव मतावलम्बी रहे हैं। आज भी पूरे क्षेत्र में शिवमंदिरं और शिवलिंग देखे जा सकते हैं तथा शिव की पूजा अनिवार्य रूप से की जा रही है। यहाँ शिव मंदिर जितने पुराने हैं, किसी अन्य देवी-देवताओं के नहीं। एक बात उल्लेखनीय है कि आज से कुछ वर्षों पहले तक छऊ नृत्य का प्रदर्शन चैत्रसंक्रान्ति के पूर्व बिल्कुल निषिद्ध था। छऊ नृत्य का यह सिलसिला जेठ महीना यानी आषाढ़ तक सीमित था। यह आषाढ़-स्नान 'हारूप पोखर में हुआ करता था। इसके बाद छऊ नृत्य का प्रदर्शन बिल्कुल निषिद्ध था | परन्तु यह इतना लोकप्रिय हो गया है कि अब तो सालों भर इसका प्रदर्शन देश-विदेश में होने लगा है । 

छऊ भारत की एक विशिष्ट नृत्य - शैली है। इस नृत्य को शैली का नाम छऊ पड़ा। इस सम्बंध में मतभेद है कुछ लोग 'छौ' शब्द की उत्पत्ति 'छावनी' से मानते हैं तो कुछ का मत है कि 'छौं' शब्द 'छाया' से आया है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि स्थानीय भाषा 'छोवा से 'छौं' शब्द बना है । 'छोवा' का अर्थ लड़का है याने लड़कों (बच्चों का नृत्य ) । इसी प्रकार अन्य लोग 'छौ' शब्द को उत्पत्ति 'छाया' एवं छम से भी मानते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग 'छौ' का अर्थ ढंग विलास एवं साज-गान लगाते है ।

स्व. राजा उपेन्द्र नाथ सिंह देव ने लिखा है कि छऊनृत्य की उत्पत्ति शिव की उपासना भाव से हुई है चैत्र संक्रांति में शिव की उपासना की जाती है। उस समय लोग हाथ में सर्प, हड्डी जानवरों के चर्म आदि लेकर भूत-प्रेत, बैताल आदि का रूप बनाकर शिवजी की बारात का रूप धारण कर नभत्य किया करते थे। आगे चलकर यही 'छऊ नृत्य' कहा जाने लगा।

श्री दुलाल चौधरी का मानना है कि 'छौ का वास्तविक अर्थ आक्रमण करना है तथा यह वीर रस का नृत्य है।

छऊ नृत्य के ही समान एक अन्य लोकनृत्य है जिसे 'नटुआ' या 'पाइका', नृत्य कहा जाता है । यह नृत्य भी मूलतः वीर-नृत्य है। सम्भवतः नटुआ नृत्य से 'छऊ नृत्य की उत्पत्ति हुई हो तो कोई आश्चर्य नहीं ।

छऊ नृत्य की उत्पत्ति के सम्बंध में पूछने से प्राप्त हुआ कि पहले चैत्र - संक्रांति की रात को शिव पूजा के अवसर पर रात्रि - जागरण करते हुए भोक्ताओं के मनोरंजन के लिए 'काप' या 'छेइब' किया करते थे। कुड़माली भाषा में 'छेइब' का अर्थ नकल करना होता है। इसी से 'छेइब' 'छौं' शब्द बना है । 'काप' या 'छेइब' का तात्पर्य विविध हास्यप्रद उपादानों से शरीर को आभूषित कर इस प्रकार हाव-भाव प्रदर्शन करना जिससे दर्शकों में स्वतः हास्य का भाव आ जाए। यहीं 'छेइब' कालान्तर में 'छौ' का रूप धारण कर लिया होगा। इसके पश्चात् इस कला में सुन्दरता और सजीवता लाने के लिए मूर्तिकारों से विषयानुकूल मुखौटा तैयार करने में सहयोग लिया गया होगा ।


मनाने का समय - छऊ नृत्य चैत्र संक्रांति को रात बारह बजे के बाद धूमधाम के साथ प्रारम्भ किया जाता है। इस रात के नृत्य को 'मुलखी नाच कहा जाता है। इसके बाद यह जेठ महीने तक चलता है। कुछ दशक पहले तक नृत्य चैत्र-संक्रांति के पहले प्रदर्शन करना निषिद्ध था । परन्तु इसकी लोकप्रियता ने इस परम्परा को तोड़ दिया है। इस नृत्य के प्रदर्शन की तैयारी चैत्र महीने के प्रारम्भ से भी शुरू हो जाती थी । नर्त्तकों को विशिष्ट प्रदर्शन के लिए बहुत अभ्यास करना पड़ता था । वस्तुतः यह पूर्वी भारत का एक विख्यात नृत्य है । 


विशेषता - यह एक फुर्तीला नृत्य हैं। कूद-कूद कर अभिनय करना इसकी विशेषता है। इसमें नर्त्तक प्रसंगानुसार अंग संचालन और विभिन्न मुद्राओं के माध्यम से अभिनय करते हैं। छऊ नृत्य मूलतः युद्ध नृत्य है। यही कारण है कि इसमें स्त्रियों की सहभागिता नहीं होती । स्त्री की भूमिका पुरूष ही करते हैं । मयूरभंज छऊ नृत्य की शैली में अब स्त्रियाँ भी भाग लेने लगी हैं। परन्तु, पुरुलिया शैली के छऊ नृत्य में इसका अभाव पाया जाता है। छऊ नृत्यों की विभिन्न शैलियों के अवलोकन से यह तथ्य उद्घाटित होता है कि इसकी मुख्य तीन प्रवृत्तियाँ है:


1. प्रकृति की अनुकृति - बाघ, भालू, बगुला, मोर आदि के रूप में नृत्य

करना ।

2. लौकिक मानवीय क्रिया-कलापों का अभिनय- जैसे शिकार करने का अभिनय, नाव - चालन, ढेंकी कूटना, धान काटना आदि ।


3. ऐतिहासिक, पौराणिक एवं धार्मिक कथाओं पर आधारित नृत्य ।

छऊ एक मुखौटा नृत्य है। मुखौटा को स्थानीय भाषा में 'मोहड़ा' या 'मुखोस' कहते है । नर्त्तक अपने चेहरे पर मुखौटा धारण कर नृत्य के समय शरीर की भाव-भंगिमा या अंग संचालन कर भावाभिव्यक्ति करता है। इस नृत्य में अंगों की भाव-भंगिमा के साथ मुखौटा की स्थिरता का कमाल देखते ही बनता है। एक ही व्यक्ति मुखौटा बदलकर कई प्रकार के रोल अदा करता है । 


नृत्य शैलियाँ- छऊनृत्य का मुख्यतः बिहार, बंगाल और उड़ीसा के तीन जिलों में प्रचलन है- पुरुलिया (मानभूम ) सरायकेला और मयूरभंज । इन्हीं के आधार पर इस नृत्य की तीन शैलियाँ विकसित हुई हैं। पुरूलिया और सरायकेला के छऊ नृत्यों में मुखौटा का व्यवहार होता है जबकि मयूरभंज - शैली में मुखौटा का प्रयोग नहीं होता है। ये मुखौटे कागज, कपड़ा और क्ले (लस्सेदार मिट्टी) के बने होते हैं। पुरुलिया जिलान्तर्गत बाघमुन्डी थाना के चड़िदा नामक गाँव मुखौटा बनाने के लिए विख्यात है ।


1. पुरुलिया शैली- पुरूलियां छऊनृत्य की शैली को 'मानभूम शैली' भी कहा जाता है क्योंकि पुरुलिया का प्राचीन नाम मानभूम है। इस शैली के नृत्य में तांडव भाव-भंगिमाओं की प्रधानता रहती है। नर्तक तीव्र गति से नृत्य करते है वे बाहें फैलाये, लट्टू के समान चक्कर काटते हुए नृत्य करते है। नर्त्तक अपने अंग-संचालन द्वारा भावों की अभिव्यक्ति करता है। इस अंग संचालन को शास्त्रीय भाषा में टोपका या चाल कहते हैं। नृत्य को प्रभावशाली ढंग से विभिन्न प्रसंगों से डफलियों के माध्यम से रोचक और आकर्षक बनाते हैं। पुरुलिया शैली के नृत्य में व्यवहृत किये जाने वाले मुखौटे में बड़े-बड़े ध्वज होते हैं जो वेश कीमती साज-सामानों से निर्मित होते हैं।


पुरुलिया 'छौ शैली के नृत्य साधारणतः पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं। जैसे- महिषासुर-वध, अभिमन्यु वध, रावण - वध, सीता-हरणं, कृष्णलीला, किरात - अर्जुन युद्ध, शिशुपाल वध आदि । किसी-किसी नर्त्तक दल द्वारा 'मेल' छऊनृत्य तथा 'एका' नृत्य का भी प्रदर्शन किया जाने लगा है तथा आधुनिक आवश्यकता को देखते हुए नित नये आयाम दिये जा रहे हैं। नृत्य के पहले गीतों द्वारा कथावस्तु परिचय दिया जाता है । छऊनृत्य के ताल की अपनी विशिष्टता है । नृत्य और संगीत के क्षेत्र में छोटानागपुर की खास विशेषताएँ है। आज छऊ नृत्य हमारे देश का एक उत्कृष्ट सांस्कृतिक धरोहर बन गया है। भारतीय नाट्यकला के समानान्तर छऊ नृत्य भी लोकनाट्य कला है, इसमें कोई सन्देह नहीं। शंकर लाल मुखर्जी का मानना है कि लोकनृत्य सभी प्रकार के 'क्लासिकल' नृत्यों की नींव है।


2. सरायकेला शैली - पुरूलिया छऊनृत्य की भांति सरायकेला के छऊनृत्य की शैली भी मुखौटा का व्यवहार होता है । परन्तु ये मुखौटे लघु आकार के ध्वजरहित होते है । सरायकेला की धरती पर ही इस प्रसिद्ध छऊनृत्य का सृजन माना जाता है। यहीं इसका विकास हुआ। इस शैली नृत्य को सरायकेला के राजपरिवार का संरक्षण मिला तथा इसी घराने के लोगों ने इसमें नयापन लाया। स्व. कुमार साहब विजय प्रताप सिंहदेव ने इस शैली को नयी दिशा दी तथा लास्य का पुट भरा। इसके पश्चात् राजकुमारं शुभेन्दु नारायण सिंहदेव ने इस शैली के नृत्य को नया मोड़ दिया। सन् 1937-38 में इन्होंने यूरोप की यात्रा की और छऊ नृत्य का प्रदर्शन किया। 1963 में राजकुमार शुभेन्दु को नेशनल अकादमी डांस ड्रामा से सम्मानित किया। अभी पुराने नर्तकों में श्री केदार साहू है। उन्होंने विश्व के अनेक देशों में छऊ नृत्य का सफलता पूर्वक प्रदर्शन किया है । नृत्य और संगीत के क्षेत्र में छोटानागपुर / झारखण्ड की अपनी निजी विशेषताएं हैं। यहाँ के लोगों के संगीत-प्रेम के संदर्भ में कहा गया है- 'सेनगे सुसुन काजी के दुरडं्, अर्थात् चलना ही नृत्य है और बोलना ही गीत है ।

छऊ नृत्य प्रकृति से जुड़ा हुआ हैं। प्रकृति के क्रिया-कलापों का अनुकरण करना मानव मात्र की मनोवृति रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह नृत्य आदिम रूप में प्रकृति की अनुकृति मात्र ही था । कालान्तर में रामायण और महाभारत की कथाओं का इस नृत्य के माध्यम से मंचन किया जाने लगा। अपने वन्य-जीवन में मानव ने वन्य पशुओं एवं प्राकृतिक उपादानों की अनुकृति करते हुए अपना एवं अपने परिजनों का मनोरंजन किया और कालान्तर अपने क्रिया-कलापों को संगीत, ताल और लयबद्ध अभिनय करने में आनन्द आया होगा | बहुत सम्भव है कि अनपढ़ ग्रामीण जनता के बीच छऊ नृत्य के द्वारा रामायण और महाभारत की कथाओं का दृश्यों के माध्यम से अवगत कराना रहा है जिस प्रकार लोककवियों द्वारा रामायण और महाभारत के विविध संदर्भों के गीतों की रचना द्वारा पौराणिक ग्रन्थों का परिचय कराना रहा है।

छऊ नृत्य छोटानागपुर का सर्वाधिक लोकप्रिय नृत्य बन गया है। यह अपने सीमित दायरे को पारकर विश्व रंगमंच पर पहुंच गया है। यहाँ के अनेक छऊ नृत्य दलों ने विदेशों में छऊ नृत्य का प्रदर्शन कर ख्याति अर्जित की है। 'छौं के विख्यात कलाकार स्व० गम्भीर सिंह मुण्डा और श्री नेपाल महतो को भारत सरकार की ओर से पद्मश्री की उपाधि देकर सम्मानित किया गया है।


छऊ नृत्य के विशेषताएं -

छऊ नृत्य मुख्य तरीके से क्षेत्रिय त्योहारों में प्रदर्शित किया जाता है। ज्यादातर वसंत त्योहार के चैत्र पर्व पर होता हैं जो तेरह दिन तक चलता है और इसमेें पूरा सम्प्रदाय भाग लेता हैं। इस नृत्य में सम्प्रिक प्रथा तथा नृत्य का मिश्रण हैं और इसमें लड़ाई की तकनीक एवं पशु कि गति और चाल को प्रदर्शित करता हैं। गांव ग्रह्णि के काम-काज पर भी नृत्य प्रस्तुत किय जाता है। इस नृत्य को पुरुष नर्तकी करते हैं जो परम्परागत कलाकार हैं या स्थानीय समुदाय के लोग हैं। ये नृत्य ज्यादातर रात को एक अनाव्रित्य क्षेत्र में किया जाता है जिसे अखंड या असार भी कहा जाता है। परम्परागत एवं लोक संगीत के धुन में यह नृत्य प्रस्तुत किया जाता हैं। इसमें मोहुरि एवं शहनाई का भी इस्तेमाल होता है। इसके अतिरिक्त तरह-तरह के ढोल, धुम्सा और खर्का आदि लोक वाद्यों का भी प्रयोग होता है। नृत्य के विषय में कभी-कभी रामायण और महाभारत की घटना का भी चित्रण होता है। छऊ नृत्य मूल रूप से मुंडा, भूमिज, महतो, कलिन्दि, पत्तानिक, समल, दरोगा, मोहन्ती, भोल, आचार्या, कर, दुबे और साहू सम्प्रदाय के लोगों द्वारा किया जाता हैं। छऊ नाच के संगीत मुखी, कलिन्दि, धदा के द्वारा दिया जाता है। छऊ नृत्य में एक विशेष तरह का मुखौटा का इस्तेमाल होता हैं जो बंगाल के पुरुलिया और सरायकेला के आदिवासी महापात्र, महारानी और सूत्रधर के द्वारा बनाया जाता है। नृत्य संगीत और मुखौटा बनाने की कला और शिल्प मौखिक रूप से प्रेषित किया जाता है।


जातीय संबद्धता - 

छऊ नृत्य मूल रूप से भूमिज, मुण्डा, कुम्हार, कुड़मी महतो, डोम, खंडायत, तेली, पत्तानिक, समल, दरोगा, मोहन्ती, भोल, आचार्या, कर, दुबे और साहू सम्प्रदाय के लोगो के द्वारा किया जाता है। छऊ नाच के संगीत मुखि, कलिन्दि, धदा के द्वारा दिया जाता हैं। छऊ नृत्य में एक विशेष तरह का मुखौटा का इस्तेमाल होता है, जो पश्चिम बंगाल के पुरुलिया और सरायकेला के सम्प्रदायिक महापात्र, महारानी और सूत्रधर के द्वारा बनाया जाता है। नृत्य संगीत और मुखौटा बनाने की कला और शिल्प मौखिक रूप से प्रेषित किय जाता है। यह मुख्यत: क्षेत्रीय त्योहारों में प्रदर्शित किया जाता है। वसंत त्योहार के चैत्र पर्व पर तेरह दिन तक छऊ नृत्य का समारोह चलता है। हर वर्ग के लोग इस नृत्य में भाग लेते हैं।

उल्लेखनीय लोग -

1. सुधेन्द्र नारायण सिंह देव - पद्म श्री
2. केदारनाथ साहू - पद्म श्री
3. मकरध्वज दरोगा - पद्म श्री
4. गंभीर सिंह मुड़ा - पद्म श्री
5. शशधर आचार्य - पद्म श्री
6. श्याम चरण पति - पद्म श्री
7. इलियाना सिटारिस्टी - पद्म श्री
8. गोपाल प्रसाद दुबे - पद्म श्री
9. बिजोय प्रताप सिंह देव
10. सुभेन्द्र नारायण सिंह देव
11. अनंतचरण साईबाबू
12. ईशा शरवानी
13. तुषार कालिया
14. शेरोन लोवेन
15. सुकेश मुखर्जी

Article Credit:-
1. Dr. H.N Singh
2. Wikipedia

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